My first poem
March 11, 2009 Leave a comment
कॉलेज के दिन बचे हैं चार
रंगों से सब पर बरसाओ प्यार
चाह कर भी ऐसे मौके नहीं आते बार बार
ये वक्त की कैसी आंखमिचोली है
आज तो रंग लगा लो यारों
बुरा न मानो होली है |
कहीं रंगों की बौछार
कहीं पिचकारी की धार
किसी के फटे कपडे तो किसी ने खायी खूब मार
बड़े ही उत्साह से रंगों के ये पुडिया हमने खोली है
आज तो रंग लगा ली यारों
बुरा न मानो होली है|
Book of the week: “The story of my experiments with truth” – Mahatma Gandhi.
PS: This is my first poem.
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PS1: Stopped drinking/smoking after reading the book.
PS2: Feeling very nostalgic …